न्याय · दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन पर पाबंदियांजारी खबर · 3 में से रिपोर्ट 3

दिल्ली की मेट्रो फिर खुल गई। सर्वोच्च न्यायालय अब भी जवाब चाहता है।

रविवार की सुनवाई से पहले मेट्रो तक पहुंच बहाल हो गई थी। अदालत का हस्तक्षेप एक अलग सवाल पूछता है: क्या प्रतिबंध वैध थे, और क्या उसके पहले के आदेश का पालन हुआ?

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  1. अपडेट 1दिल्ली पुलिस ने कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च को कुचला, 50 से अधिक घायल, 100 हिरासत में
  2. अपडेट 2156 प्रश्नपत्र लीक, 'शून्य दोषसिद्धियां': कैसे छात्रों का विद्रोह प्रधानमंत्री के दरवाजे तक पहुंचा
  3. अपडेट 3दिल्ली की मेट्रो फिर खुल गई। सर्वोच्च न्यायालय अब भी जवाब चाहता है।आप यहाँ हैं

हमारी पिछली रिपोर्ट के बाद क्या बदला

82 दिन बाद

तब

156 प्रश्नपत्र लीक, 'शून्य दोषसिद्धियां': कैसे छात्रों का विद्रोह प्रधानमंत्री के दरवाजे तक पहुंचा

तब तक अनसुलझा

  • झड़प के दौरान गांधी को लगी चोटों का सटीक विवरण, यदि उन्हें कोई चोट लगी थी — खबरों में तीखी बहस और गांधी के खुद मुक्के का जिक्र करने की बात है, लेकिन कोई भी मीडिया संस्थान स्वतंत्र रूप से खून बहने या किसी खास घाव की पुष्टि नहीं करता।
  • 20 जुलाई के लाठीचार्ज में हताहतों की सटीक संख्या (घायल, हिरासत में लिए गए) — विपक्षी नेता आंकड़ों का हवाला देते हैं, लेकिन उपलब्ध खबरों में उनकी संख्या नहीं बताई गई है।
  • हिरासत में लिए गए लोगों को आगे की प्रक्रिया के लिए किन-किन जगहों पर ले जाया गया, इसका सटीक क्रम (स्टेडियम, पुलिस थाने)।

जिस पर हमने नज़र रखने की बात कही थी

  • क्या शिक्षा मंत्री और गृह मंत्री, CJP से जुड़े विपक्षी हमले के राजनीतिक दबाव के बावजूद अपने पद पर बने रहेंगे।
  • 22 जुलाई की कार्यवाही ठप होने के बाद संसद की बैठक दोबारा कैसे शुरू होती है, और क्या CJP की मांगों पर औपचारिक बहस होती है।
  • क्या अगले CJP प्रदर्शन पर सरकार की प्रतिक्रिया उस लाठीचार्ज की रणनीति से हटती है, जिसने राजनीतिक संकट को जन्म दिया।

अब

रविवार की सुनवाई से पहले मेट्रो तक पहुंच बहाल हो गई थी। अदालत का हस्तक्षेप एक अलग सवाल पूछता है: क्या प्रतिबंध वैध थे, और क्या उसके पहले के आदेश का पालन हुआ?

अगर दिल्ली मेट्रो के गेट पहले ही फिर से खुल गए थे, तो भारत के सर्वोच्च न्यायालय को रविवार को विशेष सुनवाई की जरूरत क्यों पड़ी?

क्योंकि किसी स्टेशन को फिर से खोलने से यह सवाल हल नहीं होता कि उसे बंद करना अदालत के आदेश का उल्लंघन था या नहीं। न ही किसी प्रदर्शनकारी को रिहा करने से यह साबित होता है कि हिरासत वैध थी। 11 अक्टूबर, 2026 को अदालत ने दिल्ली में विरोध-प्रदर्शनों पर कार्रवाई के बीच वैध आवाजाही, शांतिपूर्ण सभा और पेशेवर पहुंच की रक्षा के लिए हस्तक्षेप किया—और तीन वरिष्ठ अधिकारियों से उसके पहले के परिवहन संबंधी निर्देश के बाद लगाए गए प्रतिबंधों की व्याख्या मांगी। तत्काल व्यवधान आंशिक रूप से समाप्त हो चुका था; जवाबदेही का मामला नहीं। 1 135

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना ने केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, दिल्ली पुलिस आयुक्त अनुराग कुमार और दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन की अध्यक्ष डी. थारा को अवमानना नोटिस जारी किए। पीठ ने कार्यवाही आगे बढ़ाने के लिए प्रथम दृष्टया आधार पाया—अर्थात जवाब मांगने के लिए पर्याप्त शुरुआती आधार, न कि यह अंतिम निष्कर्ष कि किसी अधिकारी ने अवमानना की। अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने 9 अक्टूबर के उस निर्देश का कथित पालन न किए जाने को लेकर याचिका दायर की थी, जिसमें मेट्रो और रेलवे सेवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से मना किया गया था। 133 135

अधिकारियों को 13 अक्टूबर तक जवाबी हलफनामे और अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करनी होगी, जिसमें पहले के आदेश पर जवाब देना होगा। उस दिन अवमानना का मामला और उससे जुड़े हिरासत के मामले आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध हैं। फिलहाल उनकी व्यक्तिगत पेशी से छूट दी गई है। यह समय-सीमा रिकॉर्ड से समर्थित स्पष्टीकरण देने की है, केवल यह एक और आश्वासन देने की नहीं कि सब कुछ सामान्य है। 136 133

यह टकराव कॉकरोच जनता पार्टी की मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध के आसपास हुआ। जंतर-मंतर पर उसकी सभा की अनुमति नहीं दी गई थी। ये मांगें विरोध-प्रदर्शन की वजह स्पष्ट करती हैं; अदालत का हस्तक्षेप न तो चुनावी अनियमितता स्थापित करता है और न ही मतदाता सूची के विवाद का फैसला करता है। 14 48

चलती ट्रेनें, खुले स्टेशन नहीं

मुख्य तथ्य

  1. 303 में से 45प्रवेश और निकास पर प्रतिबंध वाले मेट्रो स्टेशन 1
  2. करीब 25 घंटेस्टेशन तक पहुंच पर प्रतिबंध की अवधि 58
  3. 3अवमानना नोटिस पाने वाले वरिष्ठ अधिकारी 133

परिवहन विवाद एक ऐसे फर्क पर टिका है जिसे सरकारी भाषा आसानी से धुंधला कर सकती है: ट्रेनें चल सकती हैं, जबकि यात्री उन तक पहुंच नहीं पाते। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ट्रेनें बिना सेवा की मात्रा घटाए समय-सारणी के अनुसार चलीं। लेकिन नेटवर्क के 303 में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास प्रतिबंधित था—यानी लगभग हर सात में से एक स्टेशन। यह पहुंच पर एक बड़ा प्रतिबंध था, न कि इस बात का सबूत कि हर ट्रेन रुक गई थी या पूरा नेटवर्क बंद था। 1 12

9 अक्टूबर की मूल याचिका में 57 स्टेशनों पर प्रस्तावित प्रतिबंधों का मामला था; लागू किए गए प्रतिबंध 45 स्टेशनों पर थे। स्टेशन तक पहुंच पर प्रतिबंध शुक्रवार, 9 अक्टूबर को रात करीब 9 बजे शुरू हुए। शनिवार को शाम करीब 6 बजे प्रतिबंध समाप्त करने की शुरुआती घोषणा को बढ़ाकर रात 10 बजे कर दिया गया, जिससे यह अवधि करीब 25 घंटे की हुई। ये समय भारतीय मानक समय के अनुसार हैं। 161 58 64

शनिवार रात दिल्ली मेट्रो ने घोषणा की कि सभी स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार खुल गए हैं और प्रभावित इंटरचेंज सुविधाएं उपलब्ध हैं। मेहता ने अदालत को बताया कि रात करीब 10 बजे तक सभी स्टेशन फिर से खुल गए थे और उसी रात इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गई थी। इसलिए मेट्रो का फिर से खुलना रविवार की सुनवाई से पहले हुआ; इसे रविवार के निर्देशों से पहली बार हुई बहाली नहीं माना जा सकता। 57 1

मेट्रो और रेल सुविधाएं सामान्य रूप से काम करेंगी, जब तक और जब तक संविधान के अनुच्छेद 19 (2) में परिकल्पित सार्वजनिक व्यवस्था में व्यवधान को ध्यान में रखते हुए नियम लागू करना आवश्यक न हो।

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ 17

यह शर्त महत्वपूर्ण है। पीठ ने सामान्य सेवा जारी रखने की मांग की, साथ ही स्पष्ट सार्वजनिक-व्यवस्था अपवाद को बरकरार रखा। उसने भविष्य में लगने वाले हर प्रतिबंध पर रोक नहीं लगाई। इसी तरह, अपवाद का होना यह तय नहीं करता कि 9 अक्टूबर के बाद लगाए गए प्रतिबंध अदालत के निर्देश के अनुरूप थे या नहीं। अवमानना की कार्यवाही में अधिकारियों को इसी मुद्दे पर जवाब देना है।

सुरक्षाएं विरोध-प्रदर्शन से आगे तक जाती हैं

अदालत ने कानून और यातायात नियमों के अनुसार निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने और बैरिकेडों की तत्काल समीक्षा करने का निर्देश दिया। जहां वैध कानून-व्यवस्था या यातायात संबंधी जरूरतें उन्हें उचित नहीं ठहरातीं, वहां अवरोध हटाए जाने चाहिए। यह घोषणा नहीं थी कि दिल्ली में हर बैरिकेड गैरकानूनी था; यह आवश्यक नियमन और अनुचित रुकावट के बीच फर्क करने की मांग थी। 1 30

हिरासत संबंधी उसके निर्देश भी वैध प्रक्रिया को बरकरार रखते हैं। वे विशेष रूप से उन क्षेत्रों से बाहर शांतिपूर्ण, निहत्थी सभाओं की रक्षा करते हैं जहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, यानी BNSS की धारा 163 लागू है। धारा 163 सभा पर प्रतिबंध लगाने की वह शक्ति है जिसने पूर्ववर्ती आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 144 का स्थान लिया। निर्देश लोगों को वैध प्रतिबंधों की अवहेलना करने की अनुमति नहीं देते और न ही यह स्थापित करते हैं कि पहले की हर हिरासत गैरकानूनी थी। 7 50

नई दिल्ली जिले में धारा 163 के प्रतिबंध लागू थे। मोबाइल इंटरनेट का निलंबन एक अलग उपाय था: यह जनपथ–कर्तव्य पथ चौराहे के आसपास चार किलोमीटर के दायरे में लागू था और 9 अक्टूबर रात 10 बजे से 10 अक्टूबर रात 10 बजे तक निर्धारित था। यह दायरा सभा पर लगे प्रतिबंध की प्रमाणित सीमा नहीं है। दूरसंचार निलंबन और जिले के निषेधाज्ञा आदेश के कानूनी आधार और दायरे अलग-अलग थे। 12 164

अदालत ने कहा कि कानून के अनुसार इंटरनेट सेवाएं निर्बाध रहनी चाहिए और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत शक्तियों को स्पष्ट रूप से बरकरार रखा। वकीलों और पत्रकारों को अपने पेशेवर कर्तव्यों का निर्वहन करने से नहीं रोका जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के पास अब भी लगा धारा 163 का कोई नोटिस बोर्ड हटाया जाना था, ताकि न्याय तक पहुंच सुरक्षित रहे। 113 4

रिहाई से वैधता का सवाल हल नहीं होता

मेहता ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण मामलों—हिरासत में लिए गए लोगों को पेश करने या रिहा करने की मांग—में शामिल अधिकांश लोगों को पहले ही रिहा किया जा चुका था। उन्होंने 10 अक्टूबर को दोपहर करीब 2 बजे पकड़े गए और शाम करीब 6 बजे छोड़े गए लोगों का जिक्र किया। यह शनिवार को हुई रिहाई का विवरण था, रविवार की कोई नई समय-सीमा नहीं। सरकार ने तर्क दिया कि इसके चलते कई बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं अब विचारणीय नहीं रहीं। लेकिन उपलब्ध विवरण में न तो रिहा किए गए लोगों की पूरी सूची है और न ही अब भी हिरासत में मौजूद लोगों की संख्या। 11 33

कुल संख्या अब भी स्पष्ट नहीं है। बार एंड बेंच ने याचिकाकर्ताओं और मीडिया के उन दावों की खबर दी कि 7,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया और 45 हिरासत केंद्र थे; इनमें से किसी भी आंकड़े की पुष्टि नहीं हुई है। इंडियन एक्सप्रेस ने करीब 2,000 की संख्या बताई। तुलनीय कटऑफ समय, परिभाषाओं या गिनती के तरीकों के बिना, इन आंकड़ों का मिलान कर लेखापरीक्षित कुल संख्या नहीं निकाली जा सकती और न ही इनसे रिहाई की दर की गणना की जा सकती है। कथित 45 हिरासत केंद्र, प्रभावित मेट्रो के 45 स्टेशनों से पूरी तरह अलग हैं। 1 139

CJP के तीन नेताओं की रिहाई की जानकारी उपलब्ध है। अभिजीत दिपके, जिन्हें अभिजित दिपके भी लिखा गया है, सौरव दास और आशुतोष रांका को 11 अक्टूबर को दिल्ली छावनी में विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने के बाद रिहा किया गया। उनकी रिहाई निवारक कार्यवाही के जरिए हुई, न कि सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे किसी प्रमाणित आदेश से जिसमें व्यक्तिगत रूप से तीनों को रिहा किया गया हो। पुलिस ने ₹50,000 के मुचलके और एक साल तक शांति एवं सदाचार बनाए रखने की शर्त की जानकारी दी; CJP की कानूनी प्रमुख रत्ना सिंह ने भी एक साल की शांति संबंधी शर्त की पुष्टि की। 131 149 19

दिपके ने “हम प्रदर्शन नहीं करेंगे” लिखे किसी वचनपत्र पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया और कहा कि आंदोलन “फिर से सड़कों पर उतरेगा।” शांति बनाए रखने की शर्त और कभी प्रदर्शन न करने का वादा एक ही बात नहीं हैं, इसलिए उनका यह इनकार अपने आप में रिहाई के लिए सुरक्षा संबंधी पुलिस के विवरण का खंडन नहीं करता। आंदोलन को व्यापक करने का CJP का इरादा घोषित योजना है, इस बात का प्रमाण नहीं कि प्रस्तावित प्रदर्शन हुए। 152 14

द इंडिपेंडेंट की मौके से दी गई रिपोर्ट में व्यावहारिक बाधाओं का जिक्र है। उसके पत्रकार ने प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेते पुलिसकर्मियों का वर्णन किया—जो जाहिर तौर पर एक-एक करके लोगों को चुन रहे थे—और पत्रकारों को पीछे धकेलने का भी, जबकि वे बैरिकेड की अनुमति-प्राप्त ओर थे। रिपोर्टर ने बताया कि छह या सात बैरिकेड पार करने के बाद उन्हें पैदल एक और किलोमीटर चलना पड़ा; रास्ते में दुकानें बंद थीं और इंटरनेट काम नहीं कर रहा था। इन टिप्पणियों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई। 2

अहम बात यह है कि वीडियो के 11 अक्टूबर को प्रकाशित होने से यह साबित नहीं होता कि उसके दृश्य कब रिकॉर्ड किए गए थे। वे आदेश के बाद अवज्ञा साबित नहीं कर सकते और न ही शनिवार रात सेवाएं बहाल होने की घोषणाओं का सीधे खंडन करते हैं। रविवार की अन्य खबरों में लगातार हिरासत और रुकावटों के आरोप लगाए गए, जबकि RJD सांसद मनोज कुमार झा की याचिका में महिला प्रदर्शनकारियों के यौन उत्पीड़न के आरोप उठाए गए। उपलब्ध रिकॉर्ड में इन घटनाओं का निपटारा करने वाले कोई विशिष्ट अदालती निष्कर्ष नहीं हैं। 2 28 11

यह नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़ी उस स्थिति का अगला घटनाक्रम है जिसे HeyDay News ने पहले भी कवर किया था। 20 जुलाई, 2026 को हमने छात्र-नेतृत्व वाले संसद मार्च की अनुमति न दिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस द्वारा धारा 163 के इस्तेमाल और लाठीचार्ज की खबर दी थी। 22 जुलाई को हमने जवाबदेही की मांग को लेकर 21 जुलाई को धरने के बाद राहुल गांधी को हिरासत में लिए जाने की खबर दी थी। वे पहले के टकराव थे, अक्टूबर की हिरासत की संख्या नहीं। नया घटनाक्रम रविवार को हुआ न्यायिक हस्तक्षेप और अधिकारियों से 9 अक्टूबर के आदेश के अनुपालन का हिसाब देने की मांग है।

अदालत के निर्देशों की पुष्टि उसी समय की अदालती रिपोर्टिंग से होती है, लेकिन 9 अक्टूबर और 11 अक्टूबर के पूरे हस्ताक्षरित आदेश तथा सत्यापित केस नंबर स्वतंत्र समीक्षा के लिए उपलब्ध नहीं थे। आवाजाही और संचार की वास्तविक बहाली, बैरिकेड समीक्षा का पूरा होना, हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या और अलग-अलग हिरासतों की वैधता अब भी अनिर्णीत हैं। 13 अक्टूबर की सुनवाई और दाखिल किए जाने वाले दस्तावेज व्यापक आश्वासनों की जगह जांचे जा सकने वाले विवरण देने का अगला अवसर हैं। मेट्रो का खुला गेट पहुंच बहाल करने का महत्वपूर्ण कदम है। इससे जांच समाप्त नहीं होती। 1 136

जैसा प्रसारित हुआ 29 पंक्तियाँ
  1. On July 20, we reported baton charges. Now the Supreme Court demands answers. Its intervention protects commuters, peaceful protesters and the professionals trying to reach them, while requiring three senior officials to explain transport restrictions.
  2. What has actually reopened, and what must authorities still explain?
  3. India's Supreme Court held a special Sunday hearing on October 11. It ordered lawful freedom of movement and protection against illegal detention after the crackdown on the Cockroach Janta Party's protest.
  4. The July events were an earlier confrontation. On July 22, we reported Rahul Gandhi's detention after his July 21 sit-in demanding accountability. The October intervention concerns fresh restrictions and whether authorities obeyed an earlier court order.
  5. Justices Joymalya Bagchi and V. Mohana required authorities to review barricades immediately. Barriers must come down wherever legitimate law-and-order or traffic needs don't justify them. People must be allowed to move freely within the law and traffic rules.
  6. The court specifically protected peaceful, unarmed assemblies outside areas covered by Section 163. That's the assembly-restriction power in India's criminal procedure law that replaced Section 144. Detentions must follow lawful procedure, and individual detentions still face examination.
  7. Lawyers and journalists must be allowed to do their jobs. The court also required internet access within the law, while retaining Information Technology Act powers. Any Section 163 notice board still near the Supreme Court must be removed.
  8. Those protections reach beyond the protest itself. A detained person needs access to legal help. Reporters need to move and communicate to scrutinize police conduct.
  9. The Cockroach Janta Party demanded Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar's resignation. It also opposed Special Intensive Revision, the exercise revising electoral rolls. Police denied permission for its Jantar Mantar gathering. The court's intervention leaves that electoral dispute undecided.
  10. Authorities imposed assembly restrictions across New Delhi district. Separately, the mobile-internet suspension covered a four-kilometre radius around the Janpath–Kartavya Path crossing. That suspension used telecommunications powers, with a different geographic scope and legal basis.
  11. The mobile-internet suspension was scheduled from 10 p.m. October 9 until 10 p.m. October 10. Petitioners alleged that police also detained people beyond the area covered by the assembly restrictions.
  12. The court issued contempt notices to Union Home Secretary Govind Mohan, Delhi Police Commissioner Anurag Kumar and Metro chairperson D. Thara. It found enough initial grounds to proceed. The judges haven't yet decided whether any official committed contempt.
  13. Advocate Shailendra Mani Tripathi brought the contempt petition. It concerns alleged defiance of the October 9 direction against a complete prohibition on Metro and railway services ahead of the protest.
  14. The earlier petition contemplated restrictions at 57 stations. Authorities implemented entry and exit restrictions at 45 of 303 stations, about one in seven. The government says trains kept running to schedule. Passengers could still lose access even while trains operated.
  15. The station restrictions lasted about 25 hours, from Friday evening into Saturday night. Authorities extended the announced Saturday end from 6 p.m. to 10 p.m. The reopening came before Sunday's hearing, but the earlier restrictions still face judicial scrutiny.
  16. Delhi Metro announced that every station's entry and exit gates were open, and affected interchange facilities were available. Solicitor General Tushar Mehta told the court internet service had also been restored that night.
  17. The judges required normal Metro and rail services, with an exception for necessary public-order regulation. Authorities must justify restrictions within that legal framework. Reopening the gates doesn't resolve whether they complied with the October 9 direction.
  18. Mehta said most people covered by the detention challenges had already been released. He described people picked up around 2 p.m. and freed around 6 p.m. on October 10, the Saturday before the hearing.
  19. The government argued that many requests to produce or free detainees consequently no longer survived. Release can resolve someone's immediate custody, but the legality of that detention can still be examined.
  20. Petitioners claim more than 7,000 detentions. Other estimates put the count around or above 2,000. The counting methods aren't clear, and officials haven't supplied a reconciled total. Petitioners also allege 45 detention centres, a figure nobody has confirmed.
  21. The alleged detention-centre count happens to match the 45 affected Metro stations. They're separate measures. The station count gives no support to the facility allegation.
  22. Three CJP leaders did leave custody on October 11. Abhijeet Dipke, Saurav Das and Ashutosh Ranka were released after appearing before the Special Executive Magistrate at Delhi Cantonment through preventive proceedings.
  23. Police described a 50,000-rupee surety bond and a requirement to maintain peace and good behaviour for one year. CJP legal head Ratna Singh also confirmed the one-year peace condition.
  24. Dipke denied signing an undertaking that said they wouldn't protest. He said the movement would hit the streets again. His objection concerned a pledge to stop protesting, while police described a peace condition. CJP announced plans to widen the agitation nationally.
  25. Police allegedly detained protesters one by one and pushed journalists back despite their being on a barricade's permitted side. Those scenes haven't been dated, so they can't show whether police breached Sunday's directions.
  26. Shops were reportedly closed, and internet wasn't working. The described route involved six or seven barricades, followed by another kilometre on foot. The timing also prevents those observations from directly contradicting Saturday night's restoration announcements.
  27. RJD lawmaker Manoj Kumar Jha alleged sexual harassment of women protesters in a petition. Other allegations concern continued detentions and obstruction. The court hasn't made specific findings on those incidents.
  28. Metro gates and interchanges were officially announced open before the hearing. The government says internet service and most detainees' freedom had also been restored. Whether people consistently regained those freedoms in practice, and whether police completed the barricade review, still needs an account from authorities.
  29. The three officials must file their responses and a compliance report by October 13. The contempt case and connected detention proceedings return to court that day. For now, the judges have excused the officials from appearing personally.

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